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महादेवी वर्मा की मृत्यु 11 सितंबर 1987 को किसी गंभीर बीमारी की वजह से हुई थी। आगे पढ़ें महादेवी वर्मा की मृत्यु और जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें –

अगर छायावादी युग के चार प्रमुख हिंदी साहित्य की कविता के स्तंभों की बात होती है, तो मुख्य रुप से सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा का नाम लिया जाता है। इन चारों ने हिंदी साहित्य को एक अलग पहचाना दिलाई है। छायावादी युग के लेखकों में महादेवी वर्मा का योगदान अतुलनीय रहा है।

महादेवी वर्मा आधुनिक हिंदी कविता के लिए एक शक्ति की तरह उभरकर सामने आईं। ऐसा कहा जाता है कि महादेवी वर्मा को साहित्य तथा शिक्षा से जो लगाव था, वो उन्हें विरासत में प्राप्त हुआ था। उनके परिवार के ज्यादातर सदस्य लेखन के क्षेत्र से जुड़े हुए थे, जिसकी वजह से इनका भी रुझान लेखन कार्य में आ गया। इन्होंने 7 वर्ष की आयु से ही लेखन का कार्य शुरू कर दिया था। इसके बाद लोगों का इन्हें समर्थन मिलता गया और ये अपनी लेखन शैली को और अधिक निखारती चली गईं और देखते- देखते इनकी कविताएं हर किसी को पसंद आने लगीं। इसीलिए तो इन्हें आधुनिक युग की मीरा के नाम से भी संबोधित किया जाता है।

महादेवी वर्मा ने अपनी सारी ज़िंदगी लेखन में बिता दी थी। फिर 11 सितंबर, 1987 का वो दिन था, जब इन्होंने अंतिम सांस ली थी। ऐसा बताया जाता है कि इनका निधन किसी बीमारी की वजह से हुआ था। आखिर इनके निधन की क्या वजह थी इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। आज इस पोस्ट में हम महादेवी वर्मा की मृत्यु कैसे और कहां हुई थी, इसी बारे में बात करने वाले हैं।

महादेवी वर्मा का जीवन परिचय

महादेवी वर्मा की मृत्यु

हिंदी साहित्य की जानी मानी कवयित्री महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च, 1907 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था। महादेवी वर्मा के पिता का नाम गोविंद प्रसाद वर्मा था। इनके पिता अंग्रेज़ी के बहुत अच्छे जानकार थे। उनकी माता का नाम हेमरानी वर्मा था। उनकी मां हेमरानी वर्मा को हिंदी की बहुत अच्छी जानकारी थी। हिंदी के साथ- साथ महादेवी वर्मा की माता का संस्कृत में भी रुझान था।

माता- पिता दोनों के गुण महादेवी वर्मा में भी आए। उनकी मां ने उन्हें सूरदास, तुलसीदास तथा मीराबाई के बारे में बताया तथा हिंदी साहित्य के बारे में उन्हें जानकारी दी। महादेवी वर्मा की अगर शिक्षा की बात करें तो, उनकी प्रारंभिक शिक्षा इंदौर में हुई थी। फिर उन्हें छात्रवृत्ति प्राप्त हो गई, जिसके बाद वो उत्तरप्रदेश वापस आ गईं और यहीं से उन्होंने आगे की पढ़ाई को जारी रखा। यहां से उन्होंने एम ए की परीक्षा को भी पास किया था। इसके बाद फिर उन्हें प्रयाग महिला विद्यापीठ की पहली प्रधानाध्यापक भी नियुक्त किया गया था।

महादेवी वर्मा हमेशा शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी रहीं थीं। महज़ 7 साल की उम्र से ही उन्होंने कवितायें लिखना शुरू किया था। जिसके बाद उनकी कविता को चांद में प्रकाशित भी किया था। चांद में जब उनकी कविता प्रकाशित हुई, उसके बाद पाठकों से उन्हें बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली। इसके बाद उन्हें और आत्म विश्वास मिला, वो फिर लेखन कार्य में और अधिक रुचि लेने लगीं।

आगे चलकर वर्ष 1932 में महादेवी वर्मा, चांद मैगजीन के संपादक भी बनी थीं। महादेवी वर्मा एक लेखिका होने के साथ ही एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं, जिसकी वज़ह से वो सदैव महिलाओं के लिए काम करा करती थीं। महादेवी वर्मा के कालखंड के दौरान ही आज़ादी आंदोलन चरम पर था, इसीलिए उन्होंने महात्मा गांधी के साथ आज़ादी आंदोलन में भी हिस्सा लिया था। उन्होंने एक से बढ़कर एक मशहूर रचनाएं प्रस्तुत की थीं। जिसके लिए उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण, ज्ञानपीठ तथा भारतेंदु पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था।

महादेवी वर्मा की मृत्यु

महादेवी वर्मा की मृत्यु 1

महादेवी वर्मा का हिंदी साहित्य के क्षेत्र में किया गया योगदान अतुलनीय है। उन्होंने वर्ष 1955 में इलाहाबाद में साहित्यकार संसद की भी स्थापना की थी। यहां पर महादेवी वर्मा ने पंडित इला चंद्र जोशी की मदद से साहित्यकार के संपादन के कार्य को भी संभाला था। इसके बाद 1956 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से नवाजा था और 1969 में विक्रम विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की उपाधि से नवाजा था। फिर वर्ष 1987 में 11 सितंबर को इलाहाबाद में ही महादेवी वर्मा ने अंतिम सांसे ली थी। इसके बाद यहीं पर संगम किनारे उनका अंतिम संस्कार किया गया था।

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