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लाला लाजपत राय की मृत्यु 17 नवम्बर 1928 को हुई थी। साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज में घायल हुए थे ये। आगे पढ़ें इनके जीवन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें –

जब बात भारत माता की आती है, तब भारत में जन्मा हर एक वीर सपूत बिना कुछ सोचे ही अपने प्राणों की आहुति दे देता है। इसी तरह जब अंग्रजों ने भारत में अपना शासन कायम किया था, उसके बाद भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए भारत के अनेकों सपूतों ने अपने प्राणों का हंसते- हंसते बलिदान दे दिया था। इसमें से एक सपूत लाला लाजपत राय भी था। लाला लाजपत राय ने भारत की आज़ादी में एक बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ‘पंजाब- ए- केसरी’ के नाम से मशहूर लाला लाजपत राय, एक इसे स्वतंत्रता सेनानी हुए, जिन्होंने देश को आज़ाद करने के लिए अपना जीवन भी त्याग दिया था । लाला लाजपत राय ही वो शख्स थे, जिसने भारत में पंजाब नेशनल बैंक तथा लक्ष्मी बीमा कंपनी की भी स्थापना की थी।

इतिहास में लाला लाजपत राय को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के तीन प्रमुख नेताओं लाल- बाल- पाल में से लाल के नाम से जाना जाता है। स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ- साथ लाजपत राय एक समाज सुधारक के रूप में भी जाने जाते हैं।

समाज के सुधार के लिए ही लाजपत राय, दयानंद सरस्वती से भी जुड़े थे, जिनके साथ मिलकर उन्होंने आर्य समाज की स्थापना में भी एक बहुत ही अहम भूमिका निभाई थी। भारत में डीएवी यानि दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल का भी प्रसार लाला लाजपत राय ने देश भर में किया था। लाला लाजपत राय ने भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों तक जाकर देश की स्वाधीनता की चिंगारी को हवा प्रदान करने का काम करते रहे। इसके बाद स्वंत्रता आंदोलनों में भी इन्होंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। लेकिन जब भारत में साइमन कमीशन आया, तो लाला लाजपत राय ने उसका जमकर विरोध किया और उसी विरोध प्रदर्शन में उनकी मौत हो गई।

लाला लाजपत राय की मृत्यु होना सबके लिए काफी सदमे की बात थी। लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद भारत में विरोध प्रदर्शन और तेज़ी से बढ़ गया था और उनकी मौत का बदला लेने के लिए भारत में बाकी कई स्वतंत्रता सेनानी जैसे भगत सिंह आदि तरकीब बनाने लगे थे। उस तरकीब में क्या शामिल था, किस तरह से अंग्रेजों से बदला लिया जाना था तथा लाला लाजपत राय की मृत्यु आखिर हुई कैसे, जिसके बाद भारत का जनता आक्रोश बढ़ गया था, ये सब आज आप इस पोस्ट में जानने वाले हैं।

लाल- बाल- पाल की तिकड़ी

लाला लाजपत राय की मृत्यु 2

लाला लाजपत राय का जन्म 1865 में 28 जनवरी को हुआ था। उनका जन्म पंजाब के फिरोजपुर में हुआ था। लाला लाजपत राय हमेशा से स्वराज की वापसी चाहते थे। समाज और देश के लिए वो कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे।

1897 तथा 1899 में जो अकाल पीड़ित हुए थे, उनके लिए लाला लाजपत राय तन मन और धन तीनों से उपस्थित थे। उन्होंने अकाल में शिविर लगाकर पीड़ितों की मदद की थी। फिर जब आगे चलकर 1905 में बंगाल विभाजन हुआ, उस समय इन्होंने सुरेंद्रनाथ बनर्जी तथा विपिन चंद्रपाल जैसे आंदोलनकारियों के साथ हाथ मिलाया। यही वो तिकड़ी (लाल, बाल, पाल) थी, जिसकी इतिहास में हमेशा चर्चा होती है।

इस तिकड़ी ने पूरे ब्रिटूश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया था। अंग्रेजों के लिए इस तिकड़ी को तोड़ना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई थी। पूरा देश इन तीनों के समर्थन में था, जिसकी वज़ह से इन्हें और बल मिल रहा था। ये तीनों एक मुहिम चलाई, जिसके अंतर्गत इन्होंने अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करना शुरू कर दिया था तथा ब्रिटिश सरकार का भी विरोध करना प्रारंभ कर दिया। ये व्यवसायिक संस्थानों में जाकर हड़ताल किया करते थे, ताकि ब्रिटिश सेना पर कुछ असर हो।

विदेश में भी दी स्वाधीनता की चिंगारी को हवा

लाला लाजपत राय की मृत्यु 1

इसके बाद लाला लाजपत राय 1917 अक्टूबर में अमेरिका चले गए थे। यहां जाकर भी इनकी स्वराज की मांग कमज़ोर नहीं पड़ी। इन्होंने यहां आकर होम रूल लीग ऑफ अमेरिका नाम के एक संगठन को गठित किया। उनका मकसद था कि अमेरिका में इस संगठन का इस्तेमाल करके भारत में स्वाधीनता की चिंगारी को हवा देना और हुआ भी कुछ ऐसा ही।

इसके बाद जब 1920 में 20 फ़रवरी को लाजपत राय वापस भारत लौटे, तब तक वो भारत के देशवासियों के लिए एक बहुत महान नायक बन चुके थे। भारत आने के बाद उनकी लोकप्रियता देख कर ही उन्हें कांग्रेस के एक खास अधिवेशन के लिए कलकत्ता भी आमंत्रित किया गया था। इसके बाद जलियांवाला हत्याकांड के बाद अंग्रेजों के खिलाफ़ आवाज़ उठाने में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अहम भूमिका निभाई थी। फिर जब 1920 में ही गांधीजी के द्वारा असहयोग आंदोलन को शुरू किया गया तो उन्होंने एक नई पार्टी ‘कांग्रेस इंडिपेंडेस पार्टी’ को स्थापित किया था।

लाला लाजपत राय की मृत्यु: साइमन कमीशन का विरोध करने पर अंग्रेजों ने की हत्या

लाला लाजपत राय की मृत्यु

लाला लाजपत राय इसके बाद थमे नहीं, उन्होंने अग्रेजों का जमकर विरोध किया। फिर जब 1928 में 3 फरवरी के भारत में साइमन कमीशन आया था, तो इसका भारत में हर कोई विरोध करता है। शुरुआती विरोध में लाला लाजपत भी इसमें शामिल हो गए थे और विरोध प्रदर्शन करने लगे थे।

साइमन कमीशन असल में एक सात सदस्यों की कमेटी थी, जिसका काम था भारत में संवैधानिक सुधारों को समीक्षा करके एक रिपोर्ट तैयार करना। इस साइमन कमीशन का मकसद था, भारत में अंग्रेज़ी हुकूमत के हिसाब से एक संविधान तैयार करना तथा अंग्रेजी शासन को भारत में पूरी तरह से स्थापित करना। यही कारण है कि भारत में कोई भी साइमन कमीशन के पक्ष में नहीं था।

जब भारत में चौरी चौरा कांड हुआ, उसके बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया था और उसके बाद ही भारत में अंग्रेजों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन में एक ठहराव से आ गया था। लेकिन साइमन कमीशन के आने के बाद भारतीयों की शांति भंग हो उठी और फिर से लोगों के दिल में आज़ादी और अंग्रेजों को भारत से बाहर फेंकने की एक ज्वाला जल उठी थी। छोटे से विरोध से शुरू हुआ ये सफर, धीरे- धीरे पूरे देश में फैल गया और हर तरफ़ ‘साइमन गो बैक’, ‘साइमन वापस जाओ’ के नारे गूंजने लगे थे।

इसी विरोध प्रदर्शन के चलते ही 1928 में 30 अक्टूबर को क्रांतिकारियों के एक गुट ने लाहौर में प्रदर्शन करने का आयोजन किया था। इस प्रदर्शन का नेतृत्व लाला लाजपत के द्वारा किया जा रहा था। अब अंग्रेजों को एक मौका भी मिल गया था, लाला लाजपत को अपने खिलाफ की गई गतिविधियों को लेकर धूल चटाने का। अचानक से इतना बड़ा जनसैलाब देखकर अंग्रेजी सेना पहले तो घबरा गई, फिर बिना कुछ सोचे समझे, अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों पर लाठीचार्ज करना शुरू कर दिया। इसमें अंग्रेजों ने लाला लाजपत पर भी खूब लाठियां बरसाईं। इसी लाठीचार्ज की वज़ह से लाला लाजपत राय बहुत बुरी तरह से घायल हुए थे और तभी से उनके स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी थी। 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई।

लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला

लाला लाजपत राय ने 17 नवंबर, 1928 को अंतिम सांस ली थी। भारत के हर देशवासी को उनका मरना स्वीकार नहीं था। उनकी मौत के बाद जनता का आक्रोश और बढ़ गया था। लाला लाजपत राय गर्म दल के नेता भी थे। उन्हें भगत सिंह, सुखदेव, चंद्र शेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारी अपना आदर्श माना करते थे। फिर जब सभी लाला लाजपत राय की मृत्यु की ख़बर सुनते हैं, तो अंग्रेजों से बदला लेना की योजना बनाने लगते हैं। इसी योजना के तहत और अंग्रेजों से बदला लेने के लिए ही गर्म दल के नेता उत्तेजित होकर अंग्रेजी पुलिस अधीक्षक सांडर्स को 17 दिसंबर, 1928 को गोली मारकर हत्या कर देते हैं।

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