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शिवजी की मृत्यु 3 अप्रैल 1680 को हुई थी। इनकी मृत्यु एक सोची समझी साजिश थी या एक स्वाभाविक मौत, पढें आगे इस पोस्ट में –

छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इन्होंने ही भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी थी। बहुत छोटी सी उम्र से ही छत्रपति शिवाजी ने अपने जीवन को धर्म की रक्षा करने के लिए न्योछावर करना शुरू कर दिया था। बचपन से ही उन्होंने चुनौतियों का सामना करना शुरू कर दिया था और धर्म को बचाने के लिए वो हर सफल प्रयास किया करते थे।

शिवाजी को बहुत से लोग मराठा गौरव के रूप में जानते हैं, तो बहुत से ऐसे भी लोग हैं, जो उन्हें हिंदू हृदय सम्राट के रूप में पहचानते हैं। जब शिवाजी का शासन काल चल रहा था तो उस समय भारत में मुगल वंश का दबदबा था। ऐसे में शिवाजी महाराज अक्सर मुगल बादशाह औरंगजेब के साथ संघर्ष करते हुए नज़र आते थे।

शिवाजी और मुगलों के टक्कर को देखते हुए कई लोगों का ऐसा मानना था कि शिवाजी मुस्लिम विरोधी थे, जबकि ऐसा नहीं है, शिवाजी को मुस्लिम समुदाय से कोई भी समस्या नहीं थी। उनकी खुद की सेना में मुस्लिम समुदाय के लोग थे। शिवाजी को सिर्फ औरंगजेब और औरंगजेब जैसे बाकी अन्य शासकों की उद्दंडता और कट्टरता से दिक्कत थी, जिसकी वजह से वो अक्सर उनसे लोहा लेने को तैयार रहते थे।

शिवजी का जीवन परिचय

शिवाजी की मृत्यु

शिवाजी एक वीर योद्धा और प्रक्रामी शासक थे। इस महान सम्राट का जन्म 19 फरवरी, 1630 में महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था। इनका जन्म पुणे के शिवनेरी दुर्ग में एक मराठा परिवार में हुआ था। इनका पूरा नाम शिवाजी राजे भोंसले था। इनके पिता शाहाजी और माता जीजाबाई थीं। शिवाजी में अपनी माता जीजाबाई के गुण आए थे। यही कारण था कि इनका धर्म की ओर झुकाव ज्यादा था।

इनकी शुरुआती शिक्षा इन्हें इनके घर से ही प्राप्त हुई, जहां इन्हें राजनीति, युद्व कौशल आदि के बारे में बताया गया था। इसके साथ ही इन्हें ग्रंथों का भी ज्ञान दिया गया था। इसके बाद महज़ 15 साल की उम्र में वर्ष 1645 में शिवाजी ने प्रचंडगढ़ की लड़ाई में भाग लिया था। इसमें शिवाजी ने बहुत जोरदार प्रदर्शन किया था और उन्होंने सबको ये बताया था कि वो युद्ध कौशल में कितने निपुण हैं। इस युद्ध को तोरणा युद्व के नाम से भी जाना जाता है। इसी युद्ध के बाद से शिवाजी की धर्म की रक्षा करने की शुरुआत हुई थी, आगे चलकर उनका सारा जीवन ही लड़ाइयों में बीत गया।

3 अप्रैल, 1680 में उन्होंने अंतिम सांस ली। शिवाजी की मृत्यु कैसे हुई थी, ये आज भी एक रहस्य बना हुआ है। उनकी मृत्यु को लेकर ऐसा कहा जाता है कि उनकी मृत्यु होना एक सोची समझी साजिश थी। इस साजिश में कौन- कौन शामिल था और साजिश का मास्टरमाइंड कौन था, इसकी चर्चा इस पोस्ट में हम आगे करेंगे।

आदिलशाह ने शिवाजी को मारने की बनाई योजना

शिवाजी की मृत्यु 1

शिवाजी ने मुगलों की नाम में दम करके रखा था और हर कोई शिवाजी का काम तमाम करना चाहता था, लेकिन शिवाजी कभी किसी के हाथ लगे ही नहीं। उस समय बीजापुर का जो शासक था, वो आदिलशाह था। आदिलशाह भी शिवाजी को बंदी बनाना चाहता था। इसीलिए उसने एक साजिश तैयार की और शिवाजी को गिरफ्तार करने के बारे में सोचा। लेकिन, शिवाजी कहां किसी के हाथ आने वाले थे।

शिवाजी आदिलशाह के चंगुल से बच निकले। लेकिन, शिवाजी के पिता शाहाजी भोसले आदिलशाह के हाथ लग गए। आदिलशाह ने फिर मौके का फायदा उठाना चाहा और शिवाजी की जगह उनके पिता को ही बंदी बना लिया। पिता के बंदी होने की ख़बर जब शिवाजी को मिली, तो वो तुरंत आदिलशाह से टकराने निकल पड़े। उन्होंने आदिलशाह पर हमला किया और अपने पिता को आदिलशाह के कब्जे से बाहर लेकर के आए। आदिलशाह के अलावा भी शिवाजी को पकड़ने की बहुत कोशिशें की गई थीं।

औरंगजेब ने शिवाजी को बनाया बंदी, किया नजरबंद

शिवाजी के खौफ और उनकी वीरता और योग्यता के बदौलत ही, इतिहास में मुगल दक्षिण पर अपना कब्ज़ा नहीं जमा पाए थे। शिवाजी का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था, औरंगजेब भी शिवाजी के बढ़ते प्रकोप से एकदम त्रस्त आ चुका था। औरंगजेब को शिवाजी को पकड़ने का कोई भी रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। इसलिए उसने एक चालाकी दिखाई और एक साजिश रची।

साजिश के तहत उसने शिवाजी के पास एक संधि प्रस्ताव भेजा। इस संधि प्रस्ताव में लिखा था कि 23 दुर्ग शिवाजी, मुगलों को दे देंगे। ये संधि जून 1665 में हुई थी। इस संधि के लिए शिवजी आगरा आए भी थे। आगरा आने पर उन्हें ये तकलीफ हुई, कि उनका स्वागत ठीक ढंग से नहीं किया गया। इस पर उन्होंने औरंगज़ेब के सामने आपत्ति भी जताई थी।

औरंगजेब इससे नाराज हो गया और उसने शिवाजी को बंदी बनाकर उन्हें नज़रबंद कर दिया। नज़रबंद करने के साथ ही औरंगज़ेब का मकसद था शिवाजी को मौत के घाट उतारना। हालांकि, वो अपने मकसद में सफल न हुआ। शिवाजी एक दिन अचानक 17 अगस्त, 1666 में किले से भाग निकले और उन्होने जो भी किले मुंगलों को सौंपे थे, वो भी उनसे वापस प्राप्त कर लिए।

शिवाजी की मृत्यु: एक साजिश

शिवाजी की मृत्यु 3

शिवाजी की मृत्यु को लेकर अलग- अलग इतिहासकारों का अलग- अलग मत है। किसी का कहना है कि शिवाजी की मृत्यु स्वाभाविक तरीके से हुई थी। मृत्यु होने के तीन साल पहले से ही शिवाजी काफी बीमार चल रहे थे। फिर अचानक निधन होने के तीन दिन पहले उनकी हालत काफी गंभीर हो गई थी। तीन दिन से उन्हें तेज़ बुखार था। शिवाजी टायफाइड की चपेट में आ गए थे, जिसकी वज़ह से उन्हें खून की उल्टियां भी हुई थीं। इसी कारण शिवाजी की मृत्यु हो गई।

वहीं कुछ इतिहासकारों का ऐसा मानना है कि शिवाजी का मरना स्वाभाविक नहीं था, बल्कि उनकी मौत एक सोची समझी साजिश थी। इस साजिश में उनकी पत्नी सोयराबाई भी शामिल थी। सोयराबाई असल में ये नहीं चाहती थीं कि शिवाजी अपनी अन्य रानी के बेटे संभाजी को राजगद्दी प्रदान करें। वो चाहती थीं कि उनका बेटा राजाराम जो कि उस समय महज़ 10 साल का था, उसे अगला उत्तराधिकारी बनाया जाए। इसीलिए उन्होंने मंत्रियों को शिवाजी को ज़हर देने के लिए कहा।

ऐसा बताया जाता है कि जिस दिन शिवाजी की मृत्यु हुई, उस दिन हनुमान जयंती थी। सब हनुमान जयंती समारोह की तैयारी में जुटे हुए थे, हर तरफ हर्षोल्लास का माहौल था। शिवाजी का बेटा संभाजी उस दिन कोल्हापुर गया हुआ था। ऐसे में साजिशकर्ताओं को अपनी साज़िश को अंजाम देने का पूरा मौका प्राप्त हो गया था। शिवाजी की तबियत इसी दिन अचानक बिगड़ गई और उन्हें बचाया नहीं जा सका। हनुमान जयंती के दिन ही उन्होंने अंतिम सांसें लीं। शिवाजी की मृत्यु की ख़बर मिलते ही संभाजी कोल्हापुर से वापस लौट आया। वापस आने पर उसे बंदी बना लिया गया और छोटे बेटे राजाराम को राजगद्दी प्रदान कर दी गई। ये सारी बातें इसी ओर इशारा करती हैं कि शिवाजी की मृत्यु एक सोची समझी साज़िश थी।

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