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पूरा जीवन विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में समर्पित करने वाले एपीजे अब्दुल कलाम की आखिरी सांस भी उसी को समर्पित हो गई। छात्रों के बीच भाषण देते हुए बीच में ही अचानक हार्ट अटैक से हो गई थी एपीजे अब्दुल कलाम की मृत्यु।

भारत के ‘मिसाइल मैन’ ने विज्ञान और तकनीक को एक अलग पहचान दिलाई है। विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में एपीजे अब्दुल कलाम ने भारत को काफी ऊंचाइयां प्रदान की हैं। भारत को प्रगतिशील बनाने के लिए अब्दुल कलाम ने जी तोड़ मेहनत की, और उनके बेहतरीन कार्यों और सादगी की बदौलत ही उन्हें आज भी याद किया जाता है।

एपीजे अब्दुल कलाम ऐसे शख्स थे, जो युवाओं के बीच भी काफी लोकप्रिय थे। 2002 में इन्हें भारत का 11वां राष्ट्रपति भी बनाया गया था। ऐसा कहा जाता है कि डॉक्टर कलाम की सांस में भी विज्ञान बसता था। डॉक्टर कलाम ने भारत में ISRO में सैटेलाइट लांच व्हीकल (SLV-III) के निर्माण में भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

जब ISRO में सैटेलाइट लांच व्हीकल का कार्य हो रहा था, उस समय एपीजे अब्दुल कलाम ISRO के प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में कार्य कर रहे थे। इसी प्रथम सैटेलाइट व्हीकल से ही भारत ने 1980 में पहली बार रोहिणी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेजा था। इस मिसाइल को बनाने के लिए एपीजे अब्दुल कलाम ने बहुत मेहनत की थी, वो भारत को बुलंदियों पर ले जाना चाहते थे। मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद से ही उन्हें ‘मिसाइल मैन’ की उपाधि से नवाजा गया था। क्योंकि इन्होंने देश के लिए कई मिसाइलें बनाईं थीं। इसके बाद डॉक्टर कलाम ने देश के लिए अपना योगदान दिया और देश की कई परियोजनाओं में एक अहम भूमिका निभाई।

इन्होंने हमेशा देश सेवा में अपना जीवन न्योछावर किया है। देश की सेवा करते- करते ही इन्होंने अपनी आखिरी सांसे ली थीं। अब्दुल कलाम को बच्चों से बेहद प्यार था और अक्सर वो छात्रों के साथ मुलाकात करते हुए नज़र आते थे। अपनी अंतिम सांस के वक्त भी अब्दुल कलाम छात्रों के बीच भाषण देने पहुंचे थे, उसी बीच उन्हें हार्ट अटैक आया, और तुरंत ही उनकी मृत्यु हो गई। उस समय किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि यूं बीच लेक्चर में अब्दुल कलाम का निधन हो जाएगा। उनके निधन से पूरा देश शोक में डूब गया था। आखिर उस दिन हुआ क्या था और कैसे यूं अचानक एपीजे अब्दुल कलाम की मृत्यु हो गई थी, इन सारी चीजों के बारे में आगे आप इस पोस्ट में पढ़ने वाले हैं।

डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन

एपीजे अब्दुल कलाम की मृत्यु 1

एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म 1931 में 15 अक्टूबर को तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम के एक छोटे से गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम जैनुलाअबदीन था और इनकी माता का नाम असीम्मा था। इनका शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। लेकिन, डॉक्टर ने कभी भी हार नहीं मानी। उनकी बचपन से ही सीखने की बहुत इच्छा थी।

वो कुछ भी नया जानने के लिए बहुत उत्सुक रहा करते थे। संघर्षों के बाद भी कभी भी उन्होंने अपनी पढ़ाई पर पूर्ण विराम नहीं लगने दिया और पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन में एक वैज्ञानिक के रूप में कार्य करना शुरू किया। यहां पर उन्होंने ‘हावरक्राफ्ट परियोजना’ पर काम किया था।

उन्होंने भारत के महान वैज्ञानिक ‘विक्रम साराभाई’ के साथ भी काम किया था। फिर 1962 में अब्दुल कलाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में शामिक हुए। इसके बाद उन्होंने उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत को बहुत ऊंचाई पर ले गए।

डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की मृत्यु कब हुई ?

एपीजे अब्दुल कलाम की मृत्यु 2

एपीजे अब्दुल कलाम को बच्चों से बेहद प्यार था और अक्सर वो कालेजों आदि में छात्रों को संबोधित करने जाया करते थे। उन्होंने अपनी आखिरी सांसे भी छात्रों के बीच भाषण देते हुए ही ली थीं। कभी भी अब्दुल कलाम अपने कर्मो और कर्तव्यों से पीछे नहीं हटे थे।

राष्ट्रपति पद धारण करने के बाद भी अब्दुल कलाम किसी के किसी प्रकार से देश के लिए कुछ न कुछ करते ही रहते थे। फिर जब उन्होंने राष्ट्रपति पद से रिटायरमेंट लिया, उसके बाद उन्होंने छात्रों को शिक्षा का महत्व बताना शुरू कर दिया था। इनका एक ही सिद्धांत था कि छात्रों को शिक्षा के प्रति मोटिवेटेड करना और इसीलिए अकसर ये कॉलेज आदि के दौरे पर निकल पड़ते थे।

2015 में 27 जुलाई को एपीजे अब्दुल कलाम निकल पड़े थे IIM शिलांग के लिए। IIM शिलांग में भी अब्दुल कलाम सिर्फ छात्रों को मोटिवेट करने के लिए ही गए थे। इसके लिए अब्दुल कलाम आजाद ने दोपहर की फ्लाइट ली और दिन के करीब 3 बजे फ्लाइट से वो दिल्ली से गुवाहाटी पहुंचे थे। गुवाहाटी के बाद अब्दुल कलाम का काफिला कार से शिलांग के लिए रवाना हुआ था। गुवाहाटी से करीब ढाई घंटे के भीतर ही अब्दुल कलाम का काफिला शिलांग पहुंच गया था। उनके साथ हमेशा सृजनपाल सिंह रहा करते थे।

एपीजे अब्दुल कलाम के अंतिम समय में सृजन सिंह ने ही उन्हें संभाला था। सृजन सिंह ने बताया था कि अक्सर अब्दुल कलाम आजाद गाड़ी में बैठते ही सो जाया करते थे, लेकिन अपने अंतिम दिन वो कार में बैठने के बाद सोए ही नहीं थे। इसके बाद जैसे ही वो IIM शिलांग पहुंचकर, स्टेज पर भाषण देने के लिए चढ़े, उन्होंने बस भाषण में दो शब्द ही कहे होंगे कि उन्हें तुरंत हार्ट अटैक आ गया था। हार्ट अटैक के बाद वो तुरंत स्टेज पर ही गिर पड़े। आनन फानन में उन्हें उठाया गया और उठाकर अस्पताल ले जाया गया। लेकिन अस्पताल पहुंचते- पहुंचते बहुत देर हो गई थी और वहां पहुंचते ही अब्दुल कलाम आजाद की मृत्यु हो गई थी।

ये दिन था 27 जुलाई, 2015 का जब भारत देश ने एक सच्चे देशभक्त को खोया था, जिसने देश को आगे बढ़ाने के लिए और देश की शिक्षा को ऊंचाइयों तक ले जाने के बाद अपने प्राणों को भी न्योछावर कर दिया था।

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